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मैदान-ए-कर्बला में शहीद हुए लोगों की याद में उठाए गए जुलूस और ताजिए

मैदान-ए-कर्बला में शहीद हुए लोगों की याद में उठाए गए जुलूस और ताजिए
नई दिल्ली (वीटीएन)। रविवार को देश भर में मुहर्रम मानाए गए। जगह-जगह ताजिए रखेगए। मैदान-ए-कर्बला में शहीद लोगों को खिराज-ए-अकीदत पेश किया गया।
इस्लाम के नव वर्ष की शुरुआत एक मुहर्रम से होती है। यानी इस्लामिक साल का पहिला माह मुहर्रम होता है। मुर्रम के महिने में ही पैगम्बर-ए-इस्लाम मुहम्मद साहब (स.) के नवासे हजरत इमाम हुसैन और उनके 72 सथियों की मैदान ए कर्बला शहादत हुई थी। कर्बला के शहीदों की याद में हर वर्ष मुहर्रम मनाया जाता है। यह कोई त्योहार नहीं बल्कि मातम का दिन है। धर्म इस्लाम को मानने वाले मुस्लिम मुहर्रम की नौ एवं दस तारीख को रोजे रखेंते हैं।
एक रिवायत के मुताबित मुहम्मद साहब (स.) के दुनिया से जाने के बाद लगभग 60 हिजरी में मक्का से दूर कर्बला के गवर्नर जिसका नाम यजीद था ने अपने आप को खलीफा घोषित कर दिया। कर्बला जिसे अब सीरिया के नाम से जाना जाता है। वहां यजीद इस्लाम का शहंशाह बनाना चाहता था। इसके लिए उसने जनता में भय और दलशत खौफ फैलाना शुरू कर दिया था। लोगों को गुलाम बनाने के लिए वह उन पर अत्याचार करने लगा। यजीद पूरे अरब पर कब्जा करना चाहता था। उसके इस अत्याचार के आगे हजरत मुहम्मद (स.) के वारिस और उनके कुछ साथियों ने यजीद के सामने अपने घुटने नहीं टेके और जमकर मुकाबला किया। अपने बीवी बच्चों की सलामती के लिए इमाम हुसैन मदीना से इराक की तरफ जा रहे थे तभी रास्ते में यजीद ने उन पर हमला कर दिया। इमाम हुसैन और उनके साथियों ने मिलकर यजीद की फौज से डटकर सामना किया। हुसैन और उनके 72 साथियों ने यजीद के पास 8000 से अधिक सैनिकों के दांत खट्टे कर दिये थे।
हालांकि वे इस युद्ध में जीत नहीं सके और सभी शहीद हो गए। किसी तरह हुसैन इस लड़ाई में बच गए। यह लड़ाई मुहर्रम 2 तारीख से 6 तारीख तक चली। आखिरी दिन हुसैन ने अपने साथियों को कब्र में दफन किया। मुहर्रम के दसवें दिन जब हुसैन नमाज अदा कर रहे थे, तब यजीद ने धोखे से उन्हें भी
शहीद कर दिया गया।
मुहर्रम की दस तारीख को यौम-ए-आशूरा कहा जाता है। मुस्लिम समाज के लोग आशूरा को ताजिए बना कर दफन करते हैं और कर्बला में शहीद हुए लोगों को खिराज ए अकीदत पेश करते हैं।


 

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