अयोध्या मामले पर सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसले मुख्य बातें

अयोध्या। अयोध्या विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने मोटे तौर पर अपने फ़ैसले में इलाहाबाद हाईकोर्ट के फेसले का अनुमोदन किया है. सीधे तौर पर कहा जाए तो 1993 में केन्द्र सरकार ने अयोध्या में ज़मीन अधिग्रहण क़ानून की स्कीम के मुताबिक़ विवाद के निपटारे का निर्देश दिया था. जजमेंट के पैरा 805 में सुप्रीम कोर्ट ने निर्मोही अखाड़े के मुक़दमे को निश्चित मियाद के बाद दायर करने के कारण रद्द कर दिया..  कोर्ट ने निर्मोही अखाड़ा का राम जन्मभूमि मंदिर का प्रबंधक होने का दावा भी ख़ारिज कर दिया.

लेकिन संविधान के अनुच्छेद 142 में अपने विशेषाधिकार का इस्तेमाल करते हुए केन्द्र सरकार को निर्देश दिया है कि परिसर में निर्मोही अखाड़ा की ऐतिहासिक भूमिका को देखते हुए उसे मंदिर निर्माण के लिए बनने वाले ट्रस्ट के मैनेजमेंट में उचित स्थान दिया जाए…सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि केन्द्र सरकार 1993 में अधिग्रहीत 67 एकड़ ज़मीन में से सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड को 5 एकड़ आवंटित करेगी… कोर्ट ने यह भी कहा है कि सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड इस ज़मीन पर मस्जिद बनाने के लिए ज़रूरी क़दम उठाने को स्वतंत्र होगा… जजमेंट में यह भी कहा गया है कि सबसे पहला मुक़दमा दायर करने वाले हिन्दू महासभा के नेता रामगोपाल विशारद को मंदिर में पूजा का अधिकार होगा. उन्होंने सन 1949 में मस्जिद में मूर्तियां रखे जाने के बाद यह अधिकार मांगा था. विशारद अब इस दुनिया में नहीं रहे और उनके उत्तराधिकारी मुक़दमे में पक्षकार हैं. एक तरह से यह उनकी जीत हुई.

कोर्ट ने भगवान राम लला विराजमान का दावा मंज़ूर करते हुए केन्द्र सरकार को निर्देश दिया है कि वह जजमेंट के तीन महीने के अंदर मंदिर निर्माण के लिए एक कार्य योजना प्रस्तुत करे.

कोर्ट ने कहा है कि यह कार्य योजना 1993 में बने अधिग्रहण क़ानून की धारा छह और सात के अंतर्गत होगी. धारा छह में मंदिर निर्माण के लिए एक ट्रस्ट गठित करने की बात है जिसके संचालन के लिए एक बोर्ड ऑफ ट्रस्टीज़ होगा. इसी ट्रस्ट को मंदिर के निर्माण और आसपास ज़रूरी व्यवस्थाएं करने का अधिकार होगा.

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