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हज का दिन : अरफात का मैदान


मक्का। अरफात का मैदान यह वो भूमि पर हाजी अल्लाह यानी ईश्वर से प्रार्थना कर पापों का प्रायश्चित करते है। यहां हजरत आदम अलैहिस्सलाम, हजरत इब्राहीम अलैहिस्सलाम और पैगम्ब-ए-इस्लाम हजरत मोहम्मद मुस्तफा सल्लल लाहो अलैहि वसल्लम की यादे जुड़ी हुई हैं। यह हाजियों के लिए विशिष्ट अवसर हैं कि वे अपने पापों का प्रायश्चित करें और अगले दिन मिना के संस्कार के लिए तैय्यार हों।
9 जिलहिज्ज का अलग ही माहौल होता है। यद्यपि कुरबानी 10 जिलहिज्ज को होती है लेकिन ऐसा लगता है कि ईश्वर की कृपा की समीर एक दिन पहले ही बहना शुरु हो जाती है जिसे अरफा का दिन कहते हैं। अरफा का अर्थ है पहचान। वह पहचान जिसमें सोच-विचार हो और इस्लाम में सोच-विचार पर बहुत ज्यादा बल दिया गया है। अरफा का दिन ईश्वर और उसकी अनुकंपाओं को बेहतर से बेहतर ढंग से पहचानने का दिन है। यह ईश्वर का विशेष दिन है जिसे सही ढंग से उपयोग करने पर बहुत बल दिया गया है।
अरफा के दिन ईश्वर से प्रार्थना इस दिन का सबसे महत्वपूर्ण व सश्रेज़्ष्ठ कर्म है। यूं तो ईश्वर से हर समय संपर्क किया जा सकता है किन्तु कुछ समय और स्थान ऐसे हैं जहां यह संपर्क बेहतर ढंग से होता है और इसका नतीजा भी अच्छा निकलता है और अरफा को भी उन्हीं समय व स्थान में गिना जाता है।
पैगम्बरे इस्लाम के परपौत्र हजरत इमाम सादिक़ अलैहिस्सलाम फरमाते हैं, जो दुआ करना चाहते हो करो। यह पवित्र दिन ईश्वर से पापों की क्षमा मांगने का दिन है। यहां तक कि अरफा के दिन दूसरे कर्मो पर भी दुआ व पापों की क्षमा का प्रभाव पड़ता है।
9 जिलहिज्ज के दिन पैगम्बरे इस्लाम के पवित्र परिजनों के हवाले से बहुत सी दुआएं और संस्कार उद्धरित हुए हैं ताकि इस पवित्र दिन से ज्यादा से ज्यादा फायदा उठा सकें। इस दिन रोजा रखना, स्नान करना, विभिन्न प्रकार की नमाज और दुआएं पढऩे पर बल दिया गया है। इस दिन पैगम्बरे इस्लाम की दुआ का एक भाग इस प्रकार है, हर बुराई से पाक ईश्वर का नरक पर अधिकार है। हर बुराई से पाक ईश्वर की स्वर्ग में अनुकंपाएं फैली हुयी हैं। हर बुराई से पाक ईश्वर का न्याय प्रलय के दिन जाहिर होगा।
इस दिन सबसे व्यापक व मन को सुकून देने वाली दुआ का नाम दुआए अरफा है जिसे इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने अरफात के मरुस्थल में पढ़ी थी। इस दुआ में अध्यात्म के बहुत गहरे अथज़् मौजूद हैं। इसी प्रकार पैगम्बरे इस्लाम के दूसरे परपौत्रों ने भी अरफा के दिन की अहमियत पर जोर दिया है और इस दिन से विशेष दुआएं बताई हैं।
इस बात में शक नहीं कि जो लोग हज के लिए गए हैं उनके लिए अरफा का दिन बहुत ही अध्यात्मिक दिन है। वे अपना हज व्यवहारिक रूप से इस दिन अरफात के मरुस्थल में गुजार कर शुरु करते हैं। हजरत अली अलैहिस्सलाम ने अरफात के मैदान में जो मक्के से बाहर है, हाजियों के ठहरने का कारण इन शब्दों में बयान किया है, अरफात हरम की सीमा से बाहर है और ईश्वर के मेहमानों को चाहिए कि दरवो के बाहर इतना गिड़गिड़ाएं कि प्रवेश के योग्य हो जाएं। इसी प्रकार हजऱत अली अलैहिस्सलाम अरफात के मैदान की अहमियत के बारे में कहते हैं, कुछ गुनाहों के प्रभाव इतने गहरे होते हैं कि वे सिर्फ अरफात के दिन ही माफ किए जाते हैं। यही कारण है कि इस मरुस्थलीय किन्तु पवित्र भूमि में हाजी ईश्वर से क्षमा की बहुत आशा रखते हैं।  हरम पवित्र काबे के आस-पास के उस क्षेत्र को कहते हैं जहां हाजियों पर छोटे से छोटे प्राणि को कष्ट देना वर्जित है।
पैगम्बरे इस्लाम का एक कथन है, जब लोग अरफात में ठहरते हैं और अपनी मांग को गिड़गिड़ा कर पेश करते हैं तो ईश्वर फरिश्तों के सामने इन लोगों पर गवज़् करता है और उनसे कहता है, क्या नहीं देखते कि मेरे बंदे बहुत दूर से गर्म में अटे मेरे पास आए हैं। अपना पैसा मेरे मार्ग में खर्च किया है और अपने शरीर को थकाया है? मैं अपनी शाम की कसम खाता हूं कि उन्हें इस तरह पाप से पवित्र कर दूंगा जिस तरह वे मां के पेट से पैदा होते हैं। यही कारण है कि पैगम्बरे इस्लाम सल्लल लाहो अलैहि व आलेही व सल्लम बल देते हैं, अरफात में वह व्यक्ति सबसे बड़ा पापी है जो वहां से लौटे और यह ख़्याल करे कि उसे क्षमा नहीं किया गया है। इस प्रकार हाजी हज के पहले दिन अरफात के मैदान में पापों से पवित्र हो जाते हैं ताकि हाजी बनने के योग्य हो सके।
अरफात मेना पहुंचने का पास है। क्योंकि मेना में हाजी तीन दिन ठहरने के दौरान शैतान को कंकरी मारते हैं और शैतान तथा अपने वजूद से सभी शैतानी प्रतीकों को दूर करते हैं। यही कारण है कि अरफा का दिन हाजियों के लिए बहुत अहमियत रखता है। वे सांसारिक चिंताओं से दूर, अपने पालनहार से संपर्क बनाकर उससे पापों की क्षमा मांगते हैं।

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