समाचार स्वास्थ्य होम

सिजोफ्रेनिया के शीघ्र उपचार से घट सकती है आत्महत्या की दर

सिजोफ्रेनिया के शीघ्र उपचार से घट सकती है आत्महत्या की दर
नौएडा- सिजोफ्रेनिया मानसिक रूग्णता का गंभीर रूप है जिससे देश के शहरी क्षेत्रों में हर एक हजार लोगों में से करीब 10 लोग ग्रस्त होते हैं और इसके मरीजों में ज्यादातर 16 से 45 वर्ष के लोग होते हैं। भारत में सिजोफ्रेनिया के करीब 90 प्रतिशत लोगों का इलाज नहीं हो पाता है। सिजोफ्रेनिया ऐसी मानसिक समस्या है जो आत्महत्या का कारण बनती है। एक अध्ययन के मुताबिक जो लोग सिजोफ्रेनिया बीमारी से ग्रस्त होते हैं उनकी मौत का जोखिम तीन गुणा बढ़ जाता है और कम उम्र में उनकी जान चले जाने की संभावना भी अधिक बढ़ जाती है।
फोर्टिस हास्पीटल, नौएडा तथा मानस गंगा सेंटर, नौएडा के मनोरोग विशेषज्ञ डॉ. मनु तिवारी ने आज नौएडा के मानस गंगा सेंटर में विश्व सिजोफ्रेनिया दिवस की पूर्व संध्या पर आयोजित एक संवाददाता सम्मेलन में बताया कि नौएडा की पूरी आबादी में करीब एक प्रतिशत लोगों को यह बीमारी है। यह बीमारी 16 से 45 वर्ष के आयु वर्ग में सर्वाधिक पाई जाती है। इसमें मरीज को ऐसी चीजें दिखाई व सुनाई देने लगती हैं, जो वास्तविकता में हैं ही नहीं। जिस कारण वह बेतुकी बात करता है और समाज से कटने का प्रयास करता है। ऐसे में मरीज का सामाजिक व्यक्तित्व पूरी तरह से खत्म हो जाता है। इस बीमारी के काफी मरीजों में आत्महत्या की भावना भी पैदा हो जाती है ऐसे में जरूरी है कि इसका तत्काल और समुचित इलाज शुरू हो।
दुनिया भर में सिजोफ्रेनिया के बारे में जागरूकता कायम करने के उद्देश्य से 24 मई को विश्व सिजोफ्रेनिया दिवस मनाया जाता है।
Dr. Avani Tiwari, senior Psychiatrist of Metro Hospitals ने बताया कि उनके पास इलाज के लिए आने वाले मानसिक मरीजों में करीब 25 प्रतिशत मरीज सिजोफ्रेनिया के होते हैं। यह बीमारी मुख्यतः अनुवांशिक कारणों, पारिवारिक झगड़ों, तनाव, अशिक्षा, नशा आदि के कारण होती है। अगर समय रहते मरीज डॉक्टर से मिलें तो महज 8-10 माह के इलाज में उसे पूरी तरह से ठीक किया जा सकता है।
गौरतलब है कि पिछले दिनों नौएडा में सिजोफ्रेनिया का अजीबो-गरीब मामला सामने आया था। नोएडा के सेक्टर-29 निवासी सगी बहनें अनुराधा और सोनाली को भी यह बीमारी थी। लिहाजा दोनों ने एक महीने से अधिक समय से खुद को कमरे में बंद कर लिया था। खाना नहीं मिलने के कारण दोनों काफी कमजोर हो गई थीं। डॉक्टरों के अनुसार दोनों को वहां रहने वाले दूसरे लोगों पर शक होने लगा था। इस कारण दोनों ने खुद को कमरे में बंद कर लिया था। दरवाजा तोड़कर दोनों को अस्पताल में भर्ती कराया गया, लेकिन अनुराधा की जान नहीं बचाई जा सकी थी। इलाज के बाद सोनाली अब पूरी तरह से स्वस्थ हैं।
Ms. Sushree Sahu, Head of psychology, Manas Ganga Clinic said ऐसे देखा गया कि यह बीमारी महिलाओं, कम उम्र के लोगों, निम्न आय वर्ग वाले लोगों को अपने गिरफ्तर में लेती है। अध्ययन के मुताबिक जीवन प्रत्याशा बढ़ने के बावजूद सिजोफ्रेनिया के रोगी आम लोगों की तुलना में लगभग आठ साल पहले ही गुजर जाते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक सिजोफ्रेनिया युवाओं की सबसे बड़ी क्षमतानाशक बीमारी है। विश्व की दस सबसे घातक बीमारियों में सिजोफ्रेनिया शामिल है।
डॉ. मनु तिवारी बताते हैं कि यह बीमारी युवा अवस्था में सबसे अधिक पनपती है। लिहाजा इस उम्र वाले किशोर और युवकों में इस तरह के लक्षण दिखने पर जरूर विशेषज्ञ डॉक्टर से परामर्श लेना चाहिए ताकि बीमारी की स्थिति में जल्द से जल्द इसे ठीक किया जा सके। जानकारी के अभाव में कई लोग ऐसे लक्षणों को बीमारी नहीं मानते हैं। जब मरीज गंभीर हो जाता है तो तब उसे डॉक्टर के पास लाया जाता है, जिससे इलाज में काफी समय लगता है। इस बीमारी का पूरी तरह से इलाज संभव है। इसमें दवा के साथ ही काउंसलिंग से भी मरीज को ठीक किया जाता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *