संपादकीय

मां का महत्व भूल रहे हैं युवा वर्ग

मां का महत्व भूल रहे हैं युवा वर्ग
‘ मां शब्द एक ऐसा शब्द हैं जिसको आज तक कोइ परिभाषित नहीं कर पाया। यह शब्द अपने आप में इतना महान है कि इसके अर्थ को समझ पाना बहुत मुश्किल हैं फिर भी हम अक्सर इस शब्द के महत्व को भूल जाते हैं । मां का आंचल इतना बड़ा होता हैं कि उसमें समस्त सृष्टि समा सकती हैं। परंतु फिर इसकी विशालता का समानार्थक कोइ नहीं हैं। मां अपने बच्चें को हर मुसिबत से बचाकर रखती है उस पर आने वाली हर मुसिबत को वह अपने उपर ले लेती है । जब हम छोटे होते है तो वह रात भर हमारी देखभाल करने में ही निकाल देती है। जब हमें कोइ तकलीफ होती है तो वह भी दुखी हो जाती है। परंतु जब वह खुद किसी तकलीफ में होती है तो वह अपने बच्चें को खुष रखने का प्रयास करती हैं। मां का दिल इतना विशाल होता है कि वह हमेषा उन्हें कुछ देती रहती है उसकी संतान चाहे कितनी बुरी क्यों न हो वह उसकी बुराई को अपने अंदर छुपा लेती हैं। इस संसार को ही नहीं भगवान को भी मां की जरूरत होती है। भगवान श्री कृष्ण ने भी मां के रूप में यशौदा मैयंा को पाया था। सचमुच यह संसार मां शब्द पर ही कायम है। मं के बिना संसार की कल्पना करना व्यर्थ है। चाहे वह पशु-पक्षियों जीव या मनुष्य क्यों न हो। हर किसी को मां की जरूरत पड़ती है। मंा की पहचान न केवल मनुष्यों को होती है बल्कि जन्तुओं को भी होती है। बच्चा सबसे पहले अगर किसी को पहचानता है तो वो सिर्फ मां होती है। मंा षब्द में सभी गुण विद्वमान है।
ओ मंा तुझे प्रणाम अपने बच्चें तुझको प्यारे
रावण हो या राम।।
मेरे विचार मेरी मां के लिए है जो मेरे लिए भगवान के समान है।
खरखौदा: सुमन रानी

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