बांसमण्डी में इस्लाम के तीसरे खलीफा की यौमे शहादत पर हुआ जलसा

पैगम्बरे इस्लाम के एक इशारे पर अपनी जान व माल कुर्बान करने के लिए तैयार रहते थे हज़रते उस्माने गनी

हज़रते उस्माने गनी को दो नूर वाला भी कहा जाता है

कानपुर ( । अमीरूल मोमीनीन हज़रते सय्यदना उस्माने गनी रदियल्लाहो अन्हो इस्लाम के तीसरे खलीफा होने के साथ साथ पैगम्बरे इस्लाम हज़रत मोहम्मद मुस्तफा सल्ललाहो अलैह वसल्लम के दामाद भी थे। हज़रते उस्माने गनी की खुसूसियत (विशेषता) यह है कि आपके निकाह में एक केे बाद एक पैगम्बरे इस्लाम हज़रत मोहम्मद मुस्तफा सल्ललाहो अलैह वसल्लम की दो बेटियां हज़रते रूकईया और हज़रते उम्मे कुलसुम थी। यह मरतबा इस्लाम के किसी भी खलीफा को हासिल न था इसलिए आपको जिन्नूरैन दो नूर वाला भी कहा जाता है। उक्त विचार मदरसा अरबिया रज़्ज़ाकिया मदीनतुल उलूम बांस मण्डी के तत्वावधान में आयोजित यौम-ए-उस्माने गनी के जलसे को सम्बोधित करते हुए हज़रत मौलाना मुफ्ती मोहम्मद हनीफ बरकाती मुफ्ती-ए-शहर कानपुर व खलीफा सरकार रफीके मिल्लत ने बांसमण्डी के हाल में व्यक्त किया।

      श्री बरकाती ने कहा कि एक अवसर पर पैगम्बरे इस्लाम ने अपने दायें हाथ पर अपना बाया हाथ रखकर इरशाद फरमाया यह हमारा दाहिना हाथ उस्माने गनी का हाथ है। यह फज़ीलत भी सिर्फ आप ही को हासिल है। आप पैगम्बरे इस्लाम से इतनी मोहब्बत किया करते थे कि पैगम्बरे इस्लाम के एक इशारे पर अपनी जान व माल सब कुर्बान कर देने के लिए तैयार रहते थे इसलिए आपकी सखावत के चर्चे दूर दूर तक हुआ करते थे। मदीना शरीफ में एक व्यक्ति की मिलकियत (जायदाद) में एक मीठे पानी का कुआं था। पैगम्बरे इस्लाम ने उस व्यसक्ति से कहा कि तुम यह कुआं जन्नत के कुंए के बदले में बेंच दो। उस व्यक्ति ने कहा कि मेरा व मेरे बाल बच्चों का रोज़गार इससे है तो हज़रते उस्माने गनी ने उससे वह कुआं नकद रूपये देकर खरीद लिया और उस कुंए को जन्नत के कुंए बदले में मुसलमानों के नाम अल्लाह और रसूल की रज़ा के लिए वक्फ कर दिया। आप ने मस्जिदे नबवी के विस्तार के लिए आस पास के मकान व ज़मीन खरीदकर मस्जिदे नबवी में वक्फ कर दिया।URDU—

      हज़रत मौलाना मुफ्ती साकिब अदीब मिस्बाही ने कहा कि पैगम्बरे इस्लाम ने जिन दस सहाबा को दुनिया में ही जन्नती होने की खुशखबरी दी उसमें हज़रते उस्माने गनी रदियल्लाहो अन्हो भी शामिल है। जिस मकान में हज़रत उस्माने गनी का मुहासरा (घिराओ) हुआ और घर घेरकर शहीद किया तो उस वक्त हज़रत के हाथों में कुरआन शरीफ का एक नुस्खा था। आप तिलावत से तसकीने कलवी (दिल को सुकून) और रज़ाए इलाही (अल्लाह की रज़ा) में मुशतगरत (डूबे हुए) थे। बवक्त शहादत खून के कतरे कुरआने पाक की आयते करीमा पर जा गिरे। हज़रते उस्माने गनी ने अपनी शहादत से यह पैगाम दिया कि जिस्म से खून का कतरा कतरा निकल जाये लेकिन कुरआन की मुहब्बत बाकी रहे। जान चली जाये मगर कुरआन का दामन हाथो से न छूटे। अगर आप चाहते तो अपनी जान बचाने के लिए लोगों को हुक्म देते कि मुहाशरा (घिराओ) करने वालों का मुकाबला करे जिसके नतीजे में जंग, लड़ाई, खून रेज़ी होती लेकिन हज़रते उस्माने गनी ने इस तरह का कोई हुक्म नहीं दिया बल्कि अपनी शहादत मंजूर करके पूरी दुनिया को यह संदेश दिया कि उम्मत में इंतेशार, नफरत, खूनरेज़ी के बजाए इत्तेहाद व मोहब्बत पैदा होना चाहिए। आप की शहादत अठ्ठारह जिल्हीज्जा 35 हिजरी में कुरआन पाक की तिलावत करते हुए हुई। आपकी नमाज़े जनाज़ा हज़रते ज़ुबैर ने पढ़ाई और आपका मज़ार ए मुबारक जन्नतुल बकी में है। आपने 12 साल तक खिलाफत की।

      इससे पूर्व जलसे की शुरूआत तिलावते कुरआन पाक से हाफिज़ गुलाम जीलानी ने की ओर बारगाहे रिसालत में हाफिज़ जाने आलम, हाफिज़ नेमतउल्लाह, मोहम्मद मुबीन, मोहम्मद साहिल ने नात शरीफ का नज़राना पेश किया। जलसे की अध्यक्ष्ता हाफिज़ अब्दुल रहीम बहराईची व संचालन शब्बीर अशरफी कानपुरी ने की। जलसे के समापन पर मुल्क में अमन व चैन, खुशहाली व तरक्की की दुआ की गई और लोगों को मिष्ठान वितरित किया गया। इस अवसर पर प्रमुख रूप से जलसे के संयोजक मोहम्मद शाह आज़म बरकाती, हाजी मोहम्मद नसीम, हाजी मोहम्मद ताहिर, अब्दुल कलाम, हाजी महमूद आलम, मोहम्मद कैफ, मोहम्मद फिरोज़, रज़ी अहमद, मोहम्मद मंजर, शाहिद जमाल, गुलाम मोहिउद्दीन आदि लोग उपस्थित थे।

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