संपादकीय

टाइगर जिंदा है: पाक की खुफिया एजेंसी कब से हो गई भारत की मित्र

क्या अब पाक्स्तिान के विश्व कुख्यातभारत विरोधी खुफिया एजेंसी इंटर सर्विस इंटेलीजेंस (आईएसआई) भारत की मित्र और शुभचिंत बन गई है? ऐसा आखिऱकार कब से हो गया? हाल ही में रीलिज हुई सलमान खानकी फिल्म ‘टाइगर जिंदा हैंÓ में आईएसआई को भारत की हमदर्द एजेंसी के रूप में जोरदार ढंग से पेश किया गया है। मजे की बात है कि सेंसर बोर्ड ने इसे पास भी कर दिया हैढ्ढ फिल्म की मोटे तौर पर कहानी यह है कि इराक में भारत की नर्से कट्टरवादी इस्लामिक संगठन आईएसआईएस के कब्जे में आ गई हैं। उन्हें मुक्त करवाने के अभियान में पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई सहयोग करती है भारतीय खुफिया एजेंसी रॉ का। क्या रीयल लाइफ की सच्चाइयों को सीधा उलटकर रील लाइफ में किसी भी रूप में दिखाया जाना चाहिए? इस प्रकार, दिन को रात कहना कहां तक सही माना जाए?

‘टाइगर जिंदा हैÓ को दर्शकतो बहुत पसंद कर रहे हैं। फिल्म भी हिट हो चुकी है। मोटा बिजनेस कर रही हैढ्ढपैसा बरस रहा हैढ्ढयहां तक तो सब सही है। पर सवाल यह है कि क्रिएटिव फ्रीडम की आड़ में आप जो कुछ भी चाहेंगें दर्शकों कोदिखा देंगे? क्या सेंसर बोर्ड सोया हुआ है,जो टाइगर को जिंदा कर रहा हैढ्ढ ऐसी फिल्म में आईएसआई की भूमिका को लेकर सेंसर बोर्ड निर्विकार और तटस्थ भाव लिए हुए है ?
आईएसआई का सारा इतिहास
आईएसआई का सारा इतिहास भारत में गड़बड़ और अस्थिरता फैलाने के उदाहरणों से अटा पड़ा है। पाकिस्तान को मालूम है कि वो सीधे युद्ध में भारत के सामने कभी टिक नहीं सकता। इसलिए वह आईएसआई के माध्यम से भारत के खिलाफ छद्म युद्ध छेड़े हुए है। खालिस्तान से लेकर कश्मीर में देश विरोधी ताकतों को आईएसआई ने हमेशा से खाद-पानी दियाहै। सर्व विदित है कि आईएसआई का वर्तमान में मुख्यालय पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में है। आईएसआई को भारत विरोधी एजेंसी के रूप में खड़े करने में पाकिस्तान के पूर्व सैनिक तानाशाह जिया उल हक की विशेष भूमिका थी। उन्होंने अपने खासमखास सेना के अफसरों को ही आईएसआई में नई जान फूंकने की जिम्मेदारी सौंपी थी। कौन नहीं जानता कि मुंबई में साल 2008 में हुए खूनीआतंकवादी हमले और काबुल में भारतीय दूतावास को निशाना बनाकर किए गए विस्फोट के पीछे आईएसआई का ही सीधा हाथ था। यह दावा भारत का नहीं, बल्कि; बीबीसी ने दो हिस्सों में प्रसारित अपने एक चर्चित अनुसंधानात्मक कार्यक्रम में किया था। इसे ‘Óसीक्रेट पाकिस्तानÓÓ नाम दिया गया था।
पाकिस्तान से आए आतंकवादियों ने 26 नवंबर, 2008 को मुंबई के कई प्रमुख स्थानों पर हमला किया था। उन हमलों में हर जगह लश्कर-ए-तैयबा की छाप नजर आई थी। हमलों की शुरुआत से लगने लगा था कि यह लश्कर की करतूत है। एक बार जब आप लश्कर से इन हमलों को जोड़ते हैं, तो आप इसे पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई से भी निश्चित रूप से जोड़ेंगे। क्योंकि, लश्कर तोयबा तो आईएसआई का नाजायज बच्चा के रूप में विश्व विख्यात हैढ्ढ काबुल में जुलाई, 2008 में विस्फोटकों से लदी कार को भारतीय दूतावास के निकट उड़ा दिया गया था। इस हमले में 58 लोग मारे गए थे और 141 घायल हो गए थे। सूचना और सिलसिलेवार घटनाक्रम से पूरी तरह स्पष्ट हो गया था कि काबुल में विस्फोट करने वाले हक्कानी नेटवर्क को आईएसआई का समर्थन मिला हुआथा।ये तो आईएसआई के भारत-विरोध को दर्शाते मात्र दो उदाहरण ही हैं। लेकिन, अब हमारे फिल्म निर्माता उसी आईएसआई को अपने यहां एक महान और मानवीय संवेदना से ओत-प्रोत एजेंसी बनाने का असफल प्रयास कर रहे हैं।
कमर टूटी आईएसआई की
भारत में जाली करेंसी का धंधा करवाने में भी हमेशा से आईएसआई को महारत हासिल है। नोटबंदी के कारण 500 और एक हजार के नोट बंद करने के ऐलान ने पाकिस्तान की भी नींद उड़ा दी थी। आतंकवाद को पालने पोसने वाले पाकिस्तान को ऐसा झटका दिया मोदी जी ने कि वो चारों खाने चित हो गया। आईएसआई ने भारतीय करेंसी के 500 और एक हजार रुपये के जाली नोट बड़ी संख्या में छपवाकर रखे थे। ये जाली नोट पाकिस्तान की सरकारी मिलों में बने उसी कागज से तैयार किए गए, जिससे पाकिस्तानी नोट भी तैयार होते हैं। ये नकली नोट भी उन्हीं मशीनों पर छापे भी गए थे जिसका इस्तेमाल पाकिस्तान अपने नोट छापने के लिए करता है। यहां तक कि इन नोटों में वही रंग इस्तेमाल किए गए थे, जो पाकिस्तानी अपनी करेंसी छापने में करता है। पाकिस्तान में तैयार इन जाली नोटों को भारत में अलग-अलग रास्तों और तरीकों से पहुंचाया जाता था। खुफिया सूत्रों के मुताबिक जाली नोटों का बहुत बड़ा हिस्सा सीमा पार से आतंकियों की मदद के लिए भी भेजा जाता है। इतनी भयानक खुफिया एजेंसी को भारत कभी भी अपना हितैषी नहीं मान सकता। लेकिन, इसे ऐसा ही दिखने की कारीगरी “टाइगर जिन्दा हैÓÓ दे निर्माताओं ने की हैढ्ढ
और भी उदाहरण
बात सिर्फ “टाइगर जिंदा है” पर ही खत्म नहीं हो जाती। मालूम नहीं कि कब हम अपने मित्रों और शत्रुओं को पहचानना शुरू करेंगे। यकीन मानिए कि हम तो अपने ऊपर बम गिराने वालों को भी गले लगाने से पीछे नहीं हटते।
हमने अपने देश में 1965 और 1971 की जंगों के पाकिस्तानी नायक के पुत्र को नायक बनाया हुआ है। फ्लाइट लेफ्टिनेंट अरशद सामी खान को पाकिस्तान अपने सबसे आदरणीय योद्धाओं की श्रेणी में रखता है। वे उन्हीं अदनान सामी के पिता थे, जो गीत-संगीत से ज्यादा घरेलू पचड़ों में फंसे रहते हैं। अदनान सामी को तो अब भारत को भारत की नागरिकता मिल चुकी है।
फ्लाइट लेफ्टिनेंट अरशद सामी खान पर का खास तौर पर उल्लेख पाकिस्तान एयरफोर्स के संग्रहालय और वेबसाइटों में किया गया है। उनके चित्र के साथ उनकी बहादुरी का बखान करते हुए कहा गया है, ” फ्लाइट लेफ्टिनेंट अरशद सामी खान ने भारत के खिलाफ 1965 की जंग में शत्रु (भारत) का एक लडा़कू विमान,15 टैंकों और 12 वाहनों को नष्ट किया। वे रणभूमि में विपरीत हालतों के बावजूद शत्रु की सेना का बहादुरी से मुकाबला करते रहे। फ्लाइट लेफ्टिनेंट अरशद सामी खान को उनकी बहादुरी के लिए “सितारा-ए-जुर्रत” से नवाजा जाता है।”फ्लाइट लेफ्टिनेंट अरशद सामी खान के संबंध में किए गए इन दावों की जांच की जरूरत नहीं है। पाकिस्तान झूठे दावों को करने के लिए बदनाम रहा है। वहां पर सेना को तमाम युद्ध हारने के बाद भी महान माना जाता है।
आप हैरान होंगे कि उसी फ्लाइट लेफ्टिनेंट सामी साहब की किताब का विमोचन भारत की राजधानी नई दिल्ली में 28 फरवरी, 2008 को पुस्तक का नाम था- ‘थ्री प्रेसिडेंट एंड एन एड – लाइफ पॉवर एंड पॉलिटिक्स।’ उस विमोचन के मौके पर पूर्व प्रधानमंत्री आई.के.गुजराल और पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह समेत राजधानी के सेमिनार सर्किट के तमाम नामी-गिरामी हस्ताक्षर मौजूद थे। गुजराल साहब ने किताब का विमोचन किया था और तारीफों के कसीदे भी कहे तो अब मान गए होंगे न कि भारत अपने खिलाफ साजिश रचने वालों से लेकर बम फेंकने वाले को भी गले लगा लेता है।

क्या 1971 की जंग के भारतीय नायक सैम मानकेशॉ पर लिखी किसी पुस्तक का पाकिस्तान में विमोचन कभी संभव है?क्या उनके या उनके जैसे किसी भारतीय योद्धा की संतान को पाकिस्तान में वही दर्जा मिल सकता हैजो हमने अदनान सामी को अपने यहां पर दिया? टाइगर जिंदा है में आईएसआई के रोल पर देश में किसी तरह की बहस या विरोध तक का न होना स्पष्ट करता है कि हम गहरे राष्ट्रीय हितों से जुड़े सवालों पर कतई गंभीर नहीं है।

आर.के.सिन्हा

(लेखक राज्य सभा सदस्य हैं)

 

 

 

 

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