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जीवन में आनन्दित रहना भी एक कला

हर व्यक्ति जीवन में प्रसन्नता एवं आनंद चाहता है परन्तु आनंद हर किसी की झोली में यूं ही नहीं आ जाता, उसके लिये कोशिशें एवं प्रयत्न करने पड़ते हैं।
वैसे तो आनंद और प्रसन्नता अंदर की बातें हैं, मन-मस्तिष्क की भावनाएं हैं परन्तु यदि आनंद एवं प्रसन्नता की सरिताएं हमारे भीतर नहीं बह रहीं तो हमें कोई भी बात प्रसन्न नहीं कर सकती।
कहते हैं खुशियां बांटने से दुगुनी हो जाती है और गम बांटने से आधा रह जाता है। सुख और आनंद ऐसे इत्र माने जाते हैं, जिन्हें हम जितना दूसरों पर छिड़कें तो उतनी ही सुगंध हमारे भीतर आएगी।
दूसरों के काम आना, दुखियों की सेवा करने एवं निराश्रितों का आसरा बनने में एक अजीव ही आनंद छिपा है। समाजसेवा प्रकृति सेवा, सबसे बड़े आनंद स्रोत माने जाते हैं। आनंद हर चीज में है, परंतु उसका स्रोत हमारे दिल में है।
जीवन का आनंद आप हर वस्तु में खोज सकते हैं। आपको मदिरा पीने में आनंद आता है, दूसरों को नहीं, आपको दूसरों को तंग करके आनंद आता है, दूसरों को गरीबों की सेवा करने में आनंद आता है। आनंद कल्पना में है वस्तु में नहीं होता। बच्चे कपड़ों की गुड़ियों को कल्पना में साकार करके आनन्दिता हो उठते हैं।
हर आयु का अपना भिन्न आनंद है। बचपन सुंदर होता है, जवानी, मस्तानी होती है। बुढ़ापा तो सबसे सुंदर एवं प्रसन्नता पूर्वक होना चाहिये, जिसमें आप अपना ज्ञान, अनुभव दूसरों को बांट सकते हैं। पूर्ण स्वास्थ्य के साथ ज्ञान प्राप्ति में आनंद ही आनंद होता है। प्राय: देखा गया है कि हम स्वयं आनंद की अनुभूति लेने की बजाय दूसरों को यह प्रदर्शित करते हैं कि हम आनंद भोग रहे हैं।
प्रकृति पूर्ण आनंद देती है। इसका हर रूप मनमोहक होता है। इसमें पर्वत, जंगल, पक्षी, सब मन को अच्छे प्रतीत होते हैं। जिन घड़ियों में हम हंस सकते हैं उन घड़ियों में रोए क्यों।
स्वादिष्ट भोजन भी परम आनंद देता है। यदि हमारा पाचन संस्थान स्वस्थ है। हर पेय आनंद देता है यदि हमारे गुर्दे ठीक हैं। प्रकृति सुंदर प्रतीत होती है। यदि हमारी आंखें स्वस्थ हैं। हर बात में लज्जत है, अगर दिल में मजा है। शमा को जलने में मजा है और बेचारे परवाने को जल जाने में मजा है। वह रोशनी के गिर्द चक्कर काट-काट मर जाता है। हर एक की प्रकृति अलग-अलग होती है। वे सभी लोग जो जिन्दगी में खुश रहना चाहते हैं, उन्हें दूसरों में खुशियां बांटनी चाहिए, क्योंकि खुशियां बांटने से बढ़ जाती हैं। ईश्वर को आनंद स्वरूप माना गया है, उसका ध्यान, मनन, स्तुति, अर्चना, पूजा द्वारा एक विशेष आत्मानंद की सहानुभूति होती है, जो सिर्फ कर्ता ही जान-पहचान सकता है, दूसरा नहीं। जो लोग जीवन में आनंदित एवं प्रसन्नचित्त रहते हैं वे अपने जीवन में वृध्दि कर लेते हैं। क्योंकि प्रसन्न रहने वाले लोगों की रोग-चिंताएं नहीं सतातीं। खुश रहने वाले दीर्घजीवी होते हैं।
यह दुनिया बहुत खूबसूरत है इसे भरपूर देखें, इसका आनंद लें। हंसना, खुश रहना, ईश्वर ने सिर्फ मानव को ही सिखाया है। एक खूबसूरत हंसी चेहरे पर चमक छोड़ जाती है। हंसते हुए लोगों सी बीमारी भी भाग जाती है। मुस्कान प्यार की भाषा होती है। यह संगीत की तरह अंतर्राष्ट्रीय भाषा है। सदा मुस्कुराएं, आनंद में रहें। यह दीघार्यु की संजीवनी है। चिंता का दाम स्वास्थ्य की गिरावट से चुकाना पड़ता है। चेहरा मुरझा जाता है। जिंदगी बोझ बन जाती है। आनंदित रहना एक कला है, औषधि है जो कई रोगों को जड़ से उखाड़कर बाहर फैंक देती है। मुस्कुराहट एक ऐसा आभूषण है, जो आपकी सुंदरता को चार चांद लगा देती है। तो आप आज से प्रसन्न रहने का प्रण कर लें, बीमारी आपके पास से होकर गुजर जाएगी।

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