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कलम का कोई जेंडर नहीं: अचला नागर

कलम का कोई जेंडर नहीं: अचला नागर
नोएडा। मैं लेखिका हूं साहित्यकार नहीं क्योंकि साहित्यकार होना अपने आप में एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी है। साहित्य में नारी की चर्चा पर अगर मैं कहूं तो कलम का कोई जेंडर नहीं होता वह न स्त्री होती है और न ही पुरूष। नारी हमेशा दिल से सोचती है और दिमाग से महसूस करती है और यही मेरी लिखी कहानियों में नजर आता है। यह कहना था निकाह, निगाहें, नगीना, बाबुल व बागबान जैसी फिल्मों की कहानी लिखने वाली मशहूर लेखिका अचला नागर का जिन्होंने मारवाह स्टूडियो में चल रहे तीन दिवसीय ग्लोबल साहित्य समारोह में शिरकत की। इस अवसर पर उपन्यासकार डा॰ रमा सिंह, लेखिका डा॰ अमृतकौर पुरी व पूनम माटिया उपस्थित हुई।

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लेखिका व उपन्यासकार डा॰ रमा सिंह ने कहा भाषा अपना स्वरूप खो रही है भाषा खत्म बाद में होती है लेकिन व्यक्तित्व पहले खत्म हो जाता है और व्यक्तित्व हमारा आईना है। प्राचीनकाल में  नारी का कद काफी ऊंचा होता था और साहित्य में भी नारी को काफी ऊंचा सम्मान दिया गया है लेकिन सच्चाई देखें तो उसे अपने जीने के लिए हर वक्त संघर्ष करना पड़ता फिर चाहे वह उसका पिता हो भाई हो पति हो या बेटा। मैंने अपनी मां से यही सीखा था कि घर में रहो तो नारी की तरह और बाहर निकलो तो एक पुरूष की तरह। लेखिका डा॰ अमृतकौर पुरी ने कहा अभी भी भारत में लोगो को बीवी चाहिए प्रेमिका चाहिए लेकिन एक बेटी नहीं चाहिए। एक महिला को सबसे पहले खुद की इज्जत करनी चाहिए ताकि उसका वर्तमान समाज में स्थान ऊंचा हो सके।
समारोह के निदेशक संदीप मारवाह ने कहा जिस तरह से समय बदल रहा है उसी तरह से हमारा साहित्य, सोच और संस्कार बदल रहे हैं। हमारा साहित्य हमें हर पल समझाता आया है कि नारी को इज्जत और मान दीजिए।
समारोह के पहले दिन भारत के कई राज्यों से साहित्यकार और 25 देशों के प्रतिनिधि उपस्थित हुए और अपने अपने विचार रखे। इस अवसर पर कई 91वां एएएफटी शार्ट डिजीटल फिल्म समारोह का भी आयोजन किया गया जिसमें छात्रों द्वारा बनाई गई कई लघु फिल्में दिखाई गई। वहीं छात्रों द्वारा कई रंगारंग कार्यक्रम भी प्रस्तुत किए गए तो निजामी ब्रदर्स ने अपने सूफी गायन द्वारा समारोह का रंग बदल दिया।

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