समाचार

एमिटी विश्वविद्यालय में ” मूल्यों, नैतिकता एंव संस्कृती इतिहास सम्मेलन 2017 का आयोजन

एमिटी विश्वविद्यालय में ” मूल्यों, नैतिकता एंव संस्कृती इतिहास सम्मेलन 2017 का आयोजन
नोएडा (अनिल दुबे)। छात्रों को भारतीय मूल्यों, नैतिकता एंव संस्कृती के बारे मे जानकारी एंव विश्व इतिहास में उनके अह्म योगदान बताने हेतु आज एमिटी विश्वविद्यालय के आई टू ब्लाक सभागार में एमिटी इंस्टीटयूट ऑफ सोशियल सांइसेस एंव अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना द्वारा ”मूल्यों, नैतिकता एंव संस्कृती: भूतकाल एंव वर्तमान

विषय पर आधारित दो दिवसीय विष्व इतिहास सम्मेलन – 2017 का आयोजन किया गया। इस सम्मेलन का शुभारंभ अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के अध्यक्ष डा एस सी मित्तल, नई दिल्ली के राष्ट्रीय संग्रहालय के महानिदेशक एंव वाइस चांसलर डा बी आर मानी, भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद के एस्सिटेंट डायरेक्टर डा ओमजी उपाध्याय, अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के जनरल सेक्रेटरी प्रो बी एम पांडे, भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद इंडियन इंस्टीटयूट ऑफ फाइनेंस के डीन डा सौरभ अग्रवाल, दिल्ली विश्वविद्यालय के बुद्धिस्ट स्टडीज विभाग के प्रमुख प्रो के टी एस सराव, एमिटी इंस्टीटयूट ऑफ सोषियल सांइसेस के निदेषिका डा निरूपमा प्रकाश एंव एमिटी इंस्टीटयूट ऑफ सोशियल सांइसेस की डा वीनस जैन ने पांरपरिक दीप जलाकर किया। अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के अध्यक्ष डा एस सी मित्तल ने छात्रों को संबोधित करते हुए कहा कि भारत के सभी धर्मों का केन्द्र बिंदू जीवन मूल्य, नैतिकता एंव संस्कृति है। हम अपनी प्रार्थनाओं मे भी ईष्वर से यही कहते है कि हम असत्य से सत्य की ओर, अंधकार से प्रकाष की ओर और मृत्यु से अमृत की ओर बढ़े। हमारा देश संास्कृतिक,
आध्यात्मिक एंव नैतिक देष रहा है इसलिए आज भी विष्व मार्गदर्शन के लिए भारत की ओर देख रहा है। डा मित्तल ने कहा कि संस्कृती हमारे इतिहास का जड़ मूल है इसी से इतिहास का जन्म हुआ है और यही इतिहास की व्याख्या है। हमारी संस्कृती में सहयोग, सद्भावना, समन्वय और सहभागीता है। संस्कृती सदैव जोडऩे वाली कड़ी रही है और धर्म ने विश्व के प्रत्येक व्यक्ति को जोड़ा है। डा मित्तल ने कहा कि धर्म का पर्यायवाची कोई षब्द नही है हमें उसके व्यापक अर्थ को ग्रहण करना होगा जिसमें मूल्य, नैतिकता, संस्कृती, सहायता आदि सभी कुछ शामिल है। मोक्ष का विचार सिर्फ भारतीय संस्कृती मे है जहंा पर पष्चिम दर्शन समाप्त होता है वही से पूर्वी दर्शन प्रांरभ होता है। उन्होने कहा कि जीवन मूल्य, नैतिकता या संस्कृती को विचार में रखकर अपने इतिहास का विवेचन करें। नैतिक मूल्य, संस्कृती को शिक्षा से जोडऩा चाहिए। नई दिल्ली के राष्ट्रीय संग्रहालय के महानिदेशक एंव वाइस चांसलर डा बी आर मानी ने छात्रों को संबोधित करते हुए कहा कि 1921 एंव 1922 में हड़प्पा एंव मोहनजोदडज़ो की खोज के उपरांत भारतीय सभ्यता के बारे मे अधिक जानकारी प्राप्त हुई। परंपरा एंव पुरातत्व साथ साथ चलते है। बिना परंापराओं को समझे आप पुरातत्व की जानकारी को नहीं समझ सकते है। लोगों का गमनागमन पश्चिम से पूर्व की तरफ नही हुआ था बल्कि पूर्व से पश्चिम की ओर हुआ था। उन्होनें छात्रों के सुखद एंव उन्नत भविष्य की कामना की। भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद के एस्सिटेंट डायरेक्टर डा ओमजी उपाध्याय ने छात्रों को संबोधित करते हुए कहा कि मूल्य एंव नैतिकता मनुष्यों के उच्चतम मूल्यों की चेतना है। भारतीय संस्कृती का आध्यात्मिक मूल्य धर्म है। धर्म आडंबर नही है और किसी भी दिखावे से परे है। डा उपाध्याय ने कहा कि अंग्रेजी का षब्द रिलिजन, धर्म का पर्यायवाची नही है, वह मात्र धर्म के छोटे से अंष का पर्याय है। कभी हम सभी मूल्यों जैसे धैर्य, क्षमा, दमन, इंन्द्रियों पर नियंत्रण, सत्य, क्रोध ना करना आदि को अपना कर जीवन जीते थे लेकिन आज ये मूल्य खो गये जिसका परिणाम बेरोजगारी, नक्सलवाद, भष्ट्राचार है। हमारे धर्म ने विष्व को मूल्यों एंव नैतिकता का पाठ पढ़ाया है जिसकों हमे याद रखना चाहिए। अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के जनरल सेक्रेटरी प्रो बी एम पांडे ने छात्रों
को संबोधित करते हुए कहा कि संगोष्ठियों को आयोजन समस्या निवारण या लोककल्याण एंव कौषल विकास के लिए होता है। मध्यकाल में हुए आक्रमण के साथ देष मे संस्कृत एंव पाली को अनदेखा कर फारसी को महत्वतता दी जाने लगी और फारसी का ज्ञान रखने वाले को विद्वान माना जाने लगा। जैसे जैसे अंग्रेजी का प्रभाव बढ़ा फारसी पिछड़ती चली गई। जो हमारा ज्ञान संस्कृत मे था उसे पहले फारसी मे और उसके बाद उसका अंग्रेजी मे अनुवाद किया गया। आज अपने ज्ञान को पढ़ कर हम प्रभावित हो रहे है। धर्म या मूल्य क्या है, सड़क पर बहते हुए जल को व्यर्थ होने से रोकना या किसी भी असहाय की सहायता करना ही धर्म है। हमने सदैव संपूर्ण वसुधा को अपना कुटुंब समझा और प्रथानाओं मे भी सभी के लिए षंाती एंव सुख मांगा है। एमिटी इंस्टीटयूट ऑफ सोशियल सांइसेस के निदेशिका डा निरूपमा प्रकाष ने अतिथियों को संबोधित करते हुए कहा कि इस दो दिवसीय विष्व इतिहास सम्मेलन – 2017 में लगभग 200 इतिहासकार हिस्सा ले रहे है। इस प्रकार के सम्मेलनों के जरीए हमे छात्रों को नैतिक मूल्यों एंव संस्कृती का महत्व बताते है। हमारे संस्थापक अध्यक्ष डा अषोक कुमार चौहान का मानना है कि अगर षिक्षा, मूल्यों एंव नैतिकता आधारित ना हो तो उसका कोई महत्व नही है। व्यक्ति का षिक्षित एंव सफल होना तभी सार्थक है जब उसका जीवन, मूल्यों नैतिकता एंव संस्कृति से परिपूर्ण हो। इस अवसर पर अतिथियों द्वारा सम्मेलन आधारित पुस्तक एंव एमिटी इंस्टीटयूट ऑफ सोशियल सांइसेस की डा वीनस जैन द्वारा लिखित पुस्तक ” रिलिजन द रिवलेंसÓÓ का विमोचन भी किया गया। इस अवसर कई अन्य विषेषज्ञों ने अपने विचार व्यक्त किये।

—————————————————————————-

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *