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आतंकवाद कमजोरों का हथियार- ले. जन. वी.के. शर्मा

आतंकवाद कमजोरों का हथियार- ले. जन. वी.के. शर्मा

भारतीय सैनिक कठिन से कठिन परिस्थतियों में भी धैर्य के साथ मानवाधिकारों की रक्षा के लिये दृढ़ संकल्पित रहते हैं लेफ्टिनेन्ट जनरल गुरमीत सिंह

ग्वालियर। हिन्दोस्तानी सैनिक दिल से लड़ता है दिमाग से नहीं, चाहे लड़ाई दुश्मन सेना से हो या आतंकवादियों सें। लड़ते वक्त हर समय उसे यह अहसास होता है कि हिन्दुस्तान की करोड़ों अवाम के लिये लड़ रहा है। वह हर हिन्दुस्तानी के लिये भावुक हो कर लड़ता है, किसी भी आम आदमी का मानवाधिकार, और सम्मान उसके लिये महत्वपूर्ण होता है। ऐसे में यह सोचना कि वह आम आदमी के मानवाधिकारों का उल्लंघन करेगा, अनुचित है। यह उद्गार व्यक्त किये पूर्व थलसेना उपाध्यक्ष लेफ्टिनेन्ट जनरल गुरमीत सिंह (रिटा) ने और मौका था एमिटी लॉ स्कूल द्वारा “टैरेरिज्म एन्ड ह्यूमन राइट्स: लीगल पर्सपेक्टिव्स” विषय पर आयोजित नेषनल सेमिनार का। ले. जन. गुरमीत सिंह (रिटा) ने श्रीलंका, पंजाब एवं कश्मीर के अपने अनुभव सुनाते हुये बताया कि कठिन से कठिन परिस्थतियों में भी सैनिक धैर्य के साथ मानवाधिकारों की रक्षा के लिये दृढ़ संकल्पित रहते हैं, जिसके लिये उसे कठोर मानसिक प्रषिक्षण दिया जाता है।

सेमिनार में अतिथियों का स्वागत करते हुये एमिटी विष्वविद्यालय के कुलपति ले. जन. वी.के. शर्मा एवीएसएम (रिटा) ने आतंकवाद को कमजोरों का हथियार बताते हुये आंकवाद को प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष मद्द को रोकने की जरुरत है। वर्तमान परिस्थितियों में मानवाधिकारों के महत्व पर प्रकाश डालते हुये उन्होंने बताया कि भारतीय सेना में मानवाधिकारों के उल्लंघन के प्रत्येक मामले की बारीकी से जांच सुनिष्चित करने के लिये मैकेनिज्म बना हुआ है।

सेमिनार को संबोधित करते हुये प्रख्यात मानवाधिकार कार्यकर्ता, वैकल्पिक नोबल पुरस्कार के नाम से प्रख्यात राइट लाइवलीहुड पुरस्कार विजेता, सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता कोलिन गौन्जाल्विस ने आतंकवाद के विरुद्ध लड़ाई में भारतीय सैना के योगदान की सराहना करते हुये मानवाधिकारों के उल्लंघन के मामलों में संवेदनषील रुख अपनाने की वकालत की। उन्होंने कहा कि वस्तुतः आतंकवाद सामाजिक समस्या है और मानवाधिकारों का उल्लंघन उन सामाजिक समस्याओं के अस्तित्व के साथ जुड़ा है। बल प्रयोग मात्र लक्षणों का इलाज है जिससे वृहद मानवाधिकारों के उल्लंघन के बजाय सुरक्षा बलों की ज्यादती के रुप में प्रस्तुत किया जाता है। उन्होंने आजीविका का अभाव, जमीनों का जबरन हस्तांतरण, अशिक्षा एवं आर्थिक असमानता को मानवाधिकारों का हनन निरुपित करते हुये इन्हें आतंकवाद जैसी समस्याओं का कारण बताया और आतंकवाद की जड़ से समाप्ति के लिये इनके इलाज की बात कही।

निर्णय की त्रुटि एवं त्रुटिपूर्ण उद्देश्य में अन्तर बताते हुये ब्रिगेडियर नरेन्दर कुमार ने  कहा कि निर्णय की त्रुटि किसी सीमा तक क्षमा किया जा सकता है किन्तु त्रुटिपूर्ण उद्देश्य किसी प्रकार भी क्षमायोग्य नहीं है।

समापन समारोह को संबोधित करते हुये ग्वालियर जोन के पुलिस महानिरीक्षक अंशुमन यादव ने कहा कि निर्णय लेने के लिये क्षण मात्र होता है और वहीं निर्णय कभी मानवाधिकार का उल्लंघन बन जाता है तो कभी सफलता। उन्होंने कहा कि पुलिस को समस्त वैधानिक मानदंडों पर कार्य करना होता है जबकि अपराधी समस्त मापदन्डों से परे होता है। सुरक्षा बलों को हमेषा सुरक्षा में सफल होना होता है जबकि आतंकवादियों को मात्र एक बार। इन परिस्थितियों में भी सुरक्षा बल सराहनीय कार्य कर रहे हैं।

सेमिनार में भारत के विभिन्न भागों से आये प्रतिभागियों ने 44 शोधपत्र प्रस्तुत किये। आभार प्रदर्षन एमिटी लॉ स्कूल के निदेषक मेजर जनरल राजिन्दर कुमार ने किया। इस अवसर पर एमिटी के प्रो-वाइस चांसलर प्रोफेसर (डॉ.) एमपी कौशिक, रजिस्ट्रार श्री राजेश जैन सहित सभी विभाग प्रमुख, प्राध्यापकगण और विद्यार्थी मुख्य रूप से उपस्थित रहे।

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