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आजादी की लड़ाई में क्रांतिकारियों का ठिकाना थी यह मस्जिद, बनती थी अंग्रेजों के खिलाफ रणनीति

आजादी की लड़ाई में क्रांतिकारियों का ठिकाना थी  यह मस्जिद, बनती थी अंग्रेजों के खिलाफ रणनीति
नई दिल्ली/बरेली (वेब न्यूज)। नौमहला की 1749 में वजूद में आई ये मस्जिद देशभक्ति एक मिशाल है। पत्थरों से बनी इस मस्जिद की जमीन पर दफन होकर भी जिंदा भी आजादी के परवाने अमर हैं। मस्जिद में अल्लाह की इबादत भी होती थी और वतन को आजाद कराने के लिए रणनीति तैयार की जाती थी। इसी मस्जिद में ब्रितानिया हुकुमत के खिलाफ क्रांतिकारियों की गोपनीय बैठक होती थी।
मस्जिद के इमाम मौलवी शाने अली कमाल साबरी बताते हैं कि सैयद शाजी बाबा ने इस मस्जिद की नींव रखी थी। यहां नमाज अदा की जाती थी। तब यह मस्जिद कच्ची बनी थी। 1906 में यहां पक्ता निर्माण हुआ और तब यहां नौ महले बने थे। तभी से इसका नाम नौमहला मस्जिद पड़ा था।
खान बहादुर खान के साथ दीवान पं. शोभाराम ओझा, तेगबहादुर, बरेली कालेज के शिक्षक मौलवी महमूद अहसन, शिक्षक कुतुबशाह, प्रो. मुबारक समेत कई क्रांतिकारियों ने कई बार यहां शरण ली थी। अंग्रेजों से छिपकर यहां मीटिंग होती थी।
कहा जाता है यहां से 22 मई 1857 को इमाम महमूद हसन ने आजादी की खातिर अजान दी थी। उसके बाद पूरा रुहेलखंड धधक उठा था। धर्म-मजहब से परे, हिंदू और मुसलमान एकजुट हो गए थे और ब्रितानिया हुकुमत के खिलाफ आजादी का बिगुल फूंक दिया था।
ब्रितानिया हुकुमत के खिलाफ हुए पहले विद्रोह को दबाने के लिए अंग्रेजों ने पूरी ताकत झोंक दी थी। बाद में उनको पता चला कि नौमहला मस्जिद में क्रांतिकारियों को पनाह मिलती है। उन्होंने मस्जिद पर हमला कर दिया था। यहां के इमाम सैयद इस्माइल शाह अजान देते शहीद हो गए थे। उस समय यहां सैयदों के परिवार भी रहते थे। गोरों से अपनी अस्मत बचाने के लिए सैयदों के परिवार की महिलाओं, लड़कियों ने उसी कुएं में कूदकर अपनी जान दे दी थी। कहते हैं, कुएं का पानी ही लाल हो गया था। अब यह कुआं पाट दिया गया है।

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