अयोघ्या मामले पर आए सुप्रीमकोर्ट के फैसले से मुसलमान पक्ष असंतुष्ट, ओवैसी बोले, “पांच एकड़ ज़मीन की ख़ैरात नहीं चाहिए”

नई दिल्ली। अयोध्या में राम जन्मभूमि बाबरी मस्जिद भूमि विवाद पर सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले पर AIMIM नेता असदुद्दीन ओवैसी और मुसलमान पक्ष के वकील ज़फ़रयाब जिलानी ने असंतोष ज़ाहिर किया है. असदुद्दीन ओवैसी ने राजीव धवन और मुस्लिम पक्ष की बात सुप्रीम कोर्ट में रखने वाले दूसरे लोगों को शुक्रिया कहते हुए अपनी बात शुरू की और फ़ैसले पर असंतोष जताते हुए तथ्यों के ऊपर आस्था की जीत बताया है. वहीं ज़फ़रयाब जिलानी ने कहा है कि वो वकीलों से बात करके पुनर्विचार याचिका दाख़िल करने पर फ़ैसला करेंगे.

उन्होंने कहा, “सुप्रीम कोर्ट सुप्रीम ज़रूर है पर अचूक नहीं है. ये जस्टिस जेएस वर्मा ने कहा था. जिन्होंने 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद को गिराया, आज उन्हीं को सुप्रीम कोर्ट कह रहा है कि ट्रस्ट बनाकर मंदिर का काम शुरू कीजिए. मेरा कहना ये है कि अगर मस्जिद नहीं गिराई गई होती तो कोर्ट क्या फ़ैसला देता?”

अवोसी ने कहा हम अपने क़ानूनी अधिकार के लिए लड़ रहे थे. मुसलमान ग़रीब है और भेदभाव भी उसके साथ हुआ है. लेकिन इन तमाम मजबूरियों के बावजूद मुसलमान इतना गया गुज़रा नहीं है कि वो अपने अल्लाह के घर के लिए पांच एकड़ ज़मीन न ख़रीद सके. हमें किसी को ख़ैरात या भीख की ज़रूरत नहीं है.

देखना होगा कि मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड पांच एकड़ ज़मीन को क़बूल करेंगे या नहीं, मेरी निजी राय ये है कि हमें इस प्रस्ताव को ख़ारिज़ करना चाहिए.

मुल्क अब हिंदू राष्ट्र के रास्ते पर जा रहा है. संघ परिवार और बीजेपी अयोध्या में इसे इस्तेमाल करेगी.

वहां शरीयत के ऐतबार से मस्जिद थी, है और रहेगी. हम अपनी नस्लों को ये बताते जाएंगे कि यहां 500 साल तक मस्जिद थी. लेकिन 1992 में संघ परिवार ने और कांग्रेस की साज़िश की वजह से उस मस्जिद को शहीद किया गया. सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड के वकील ज़फ़रयाब जिलानी ने भी इससे पहले फ़ैसले पर असंतोष जताया.

उन्होंने कहा है कि हम सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का सम्मान करते हैं लेकिन हम संतुष्ट नहीं हैं. हम देखेंगे कि आगे इस पर क्या किया जा सकता है. फ़ैसले के बाद उन्होंने प्रेस क्रॉन्फ्रेंस की. जिलानी ने कहा, “फ़ैसला पढ़ते समय सीजेआई ने सेक्युलरिज़म और 1991 के एक्ट ऑफ़ वर्शिप का ज़िक्र किया. उन्होंने ये तो माना कि टाइटल सूट नंबर चार और पांच के हक को मानते हैं लेकिन उन्होंने सारी ज़मीन टाइटल सूट नंबर पांच  (हिंदू पक्ष) को दे दी.”

“उन्होंने आर्टिकल 142 के तहत ये फ़ैसला दिया. हमें देखना होगा कि क्या 142 को इस सीमा तक खींचा जा सकता है. हम दूसरे वकीलों से ये समझेंगे और तय करेंगे कि हमें पुनर्विचार याचिका दायर करनी है या नहीं. लोगों से अपील करता हूं कि शांति और संयम बनाए रखें. ये किसी की हार या जीत नहीं है.”

“अभी हम यही कह सकते हैं कि इस फ़ैसले की हमें उम्मीद नहीं थी. लेकिन क्या करना है वो बाद में बता सकेंगे. जजमेंट पढ़ने के दौरान चीफ़ जस्टिस ने कई ऐसी बातें कहीं हैं जिसका आने वाले वक़्त में बेहतर परिणाम होगा. हम जजमेंट के हर हिस्से की आलोचना नहीं कर रहे हैं.”

ज़फ़रयाब जिलानी ने कहा, “लेकिन कुछ बातें थोड़ी अटकती है. कोर्ट ने माना कि मस्जिद का ढांचा मीर बाक़ी ने बनाया जिसका मतलब है कि 1528 में मस्जिद बनी. आप उस वक़्त के यात्रा वृतांत लिखने वालों के अकाउंट मान रहे हैं उसमें लिखा है कि यहां तीन गुंबदों वाली मस्जिद थी. लेकिन उनका कहना है नमाज़ पढ़ी जाती थी, ये नहीं लिखा. लेकिन ये भी तो नहीं लिखा की पूजा हो रही है. ये तर्क समझ नहीं आया. हमारा दावा अंदर के हिस्से के लिए था क्योंकि बाहर के मैदान में चबूतरा पहले से मौजूद था. फिर भी अंदर की ज़मीन सूट पांच को दे दी गई. हमारी शरीयत के मुताबिक हम अपनी मस्जिद किसी को नहीं दे सकते. न दान दे सकते हैं और न ही बेच सकते हैं.” बाबरी मस्जिद के पक्षकार रहे इक़बाल अंसारी ने कहा फ़ैसले पर कहा, ”हम 200 फ़ीसदी संतुष्ट हैं. कोर्ट ने जो फ़ैसला किया वो सही किया. हम पहले भी कोर्ट का सम्मान करते रहे हैं और आज भी यही कर रहे हैं. सरकार ने अगर ये मसला तय कर दिया तो ये अच्छी बात है. सरकार जो करेगी हम उसे मानेंगे. मैं हिंदू और मुसलमान दोनों भाईयों को कहना चाहता हूं कि सरकार ने ये मसला ख़त्म कर दिया

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